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अंडरवर्ल्ड का आतंक से ‘कांट्रेक्ट’
जैसे अमिताभ बच्चन के एंग्री यंगमैन वाले जमाने में अकेला नायक ही अंत में गुंडों के पूरे गिरोह को अकेले ही निपटा कर विजेता बनता था, ठीक वैसा ही फार्मूला रामू ने आंतकवाद से निपटने के लिए अपनाया है जो सहज ही गले नहीं उतरता। रामू ने अपने युवा हीरो आधविक महाजन के माध्यम से विमर्शा दिया है कि आंतकवाद के अंतरराष्ट्रीय और खूंरवार नेटवर्क से अकेला व्यक्ति भी निपट सकता है। यानी अकेला चना भाड़ फोड़ सकता है। जो कि नामुकिन सा है रामू की यही निश्पत्ति अतार्किक है। अंडरवर्ल्ड के दोनों गिरोहों और आंतकवादी सरगना के ढेर हो जाने के बाद भी फिल्म को समाप्त किया जा सकता था। हीरो आधविक महाजन ने अपने सधे हुए अभिनय से उम्मीद जगाई है कि इंडस्ट्री में यह सिक्का चल सकता है। लेकिन रामू की दूसरी खोज फिल्म की हीरोईन साक्षी गुलाटी को कुछ कर दिखाने का मौका ही नहीं मिला है। फिल्म में उसकी मौजूदगी महज औपचारिक भर है। आतंकवादी सरगना बने जाकिर हुसैन ने हमेशा की तरह प्रभावशाली और जीवंत अभिनय किया है। उन्होंने अपने चरित्र को एक ‘विचार’ की तरह जिया है। फिल्म में दो गैंग हैं। गूंगा गैंग में गूंगा और उसकी पत्नी (क्रमश: उपेन्द्र लिमये तथा अमृता सुभाश ने उम्दा अभिनय की मिसाल कायम की है। आर.डी गैंग के मुखिया सुमीत निझावन ने भी बेहद सहज अभिनय किया है। फिल्म में एक तारतम्यता क्रमश: विकसित होती है जो अंत पर पहुंच कर टूट जाती है। आतंकवादी नेटवर्क तक पहुंचने और फिर उसे तबाह करने के मंसूबे के तहत पूर्व सैन्य अधिकारी की सेवाएं लेने के लिए उसे लगभग डॉन के रूप में प्रस्तुत कर गिरोह में शामिल कराने का विचार नया भले ही हो लेकिन स्वाभाविक नहीं लगता। फिर भी रामू की इस फिल्म को यदि आप चाहें तो एक बार देखा ही जा सकता है। धीरेन्द्र अस्थाना |
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