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‘सबका’ सफाया कर देंगी कफलिन! मनीष शर्मा
सिडनी की निराशा वर्ष 1999 में कंधे की चोट ने उनका बहुत नुकसान किया। इसके चलते न वह नियमित रूप से अभ्यास कर सकीं, और कई मीटों में भी भाग लेने से वंचित रहीं। मगर, उनके लिए सबसे बड़ी निराशा वर्ष 2000 में सिडनी आ॓लंपिक की एक भी स्पर्धा के लिए भी क्वालिफाई न कर पाना रहा। पर, जुझारू नैटाली ने हार नहीं मानी और शानदार वापसी करते हुए कई रिकार्ड स्थापित किए। इनमें से एक बहुत ही खास रिकार्ड रहा सौ मी. बैक स्ट्रोक में। वह एक मिनट से भी कम (00:59:58) समय में रेस पूरी करने वाली इतिहास की पहली तैराक बनीं। एथेंस आ॓लंपिक ने बनाया स्टार पिछले आ॓लंपिक में वह मीडिया की सबसे ज्यादा ‘चहेती’ थीं। और इस बेहतरीन तैराक ने किसी को भी निराश नहीं किया। नैटाली ने सौ मी. बैक और सौ मी. फ्रीस्टाइल के लिए क्वालीफाइ किया। इसके बाद उन्हें प्रवंधन ने तीन रिले (आठ सौ मी. फ्री रिले, चार सौ मी. फ्री रिले और चार सौ मी. मेडले रिले) का हिस्सा बनाया। नैटाली ने इसका बखूबी जवाब दिया और वह दो स्वर्ण, दो रजत और एक कांस्य पदक जीतकर अमेरिका की बड़ी स्टार बन गई। साथ ही, वह एक ही मीट में पांच पदक जीतने वालीं अमेरिका की तीसरी खिलाड़ी भी बनीं। पसंदीदा स्पर्धा से रहीं सात साल दूर ऐसा लगता है कि कफलिन और दो सौ मी. व्यक्तिगत मेडले स्पर्धा एक-दूसरे के लिए ही बने हैं। तैराकी के इतिहास में इस वर्ग में कुछ ही तैराक इतने अच्छे हैं, जितनी कि कफलिन। मगर, एक समय था, जब वह अन्य स्पर्धाओं में विश्व फतह कर रही थीं, तो दो सौ मी. व्यक्तिगत मेडले से उन्हें ‘एजर्जी’। और सात साल तक उन्होंने इस स्पर्धा में हिस्सा नहीं लिया था। कफलिन ने कहा, ‘मुझे यह स्पर्धा पसंद नहीं थी और समझ में भी नहीं आती थी।’ इससे उनके कोच और मित्र भी नाराज रहते थे। लगभग सात साल बाद उन्होंने आधे-अधूरे मन से स्टैनफोर्ड में इस स्पर्धा में भाग लिया। वह फानल के लिए भी क्वालीफाइ न कर सकीं। मगर, रात को अभ्यास में अपनी टाइमिंग से वह हैरत में पड़ गई। सुबह के मुकाबले इसमें आठ सेकेंड का अंतर था। कफलिन के कहा, ‘पिछले दस-पंद्रह सालों के दौरान भी मैंने इतना सुधार नहीं किया था।’ कुछ माह पहले उन्होंने लास एंजिल्स में इसमें भाग लिया और विश्व रिकार्ड बनाने से चूक गईं। पेइचिंग में संभावनाएं अमेरिका की गोल्डन गर्ल कफलिन छह (सौ मी. बैक स्ट्रोक, सौ मी. फ्रीस्टाइल, दो सौ मी. व्यक्तिगत मेडले, और तीन रिले) स्पर्धाओं में हिस्सा लेंगी। उन्होंने चंद दिनों पहले ही आ॓लंपिक ट्रायल में सौ मी. बैक स्ट्रोक में विश्व रिकार्ड स्थापित किया। खुद कफलिन का कहना है,‘उन्हें पेइचिंग में एथेंस के प्रदर्शन को पीछे छोड़ने की उम्मीद है।’ अगर, ऐसा होता है, तो स्पर्धाओं के सभी छह स्वर्ण उनके नाम होंगे। यानि, वह ‘सबका’ सफाया कर देंगी! निशाने पर हैं तीर मनोज चतुर्वेदी
चार साल पहले एथेंस में भारत का सत्यदेव प्रसाद और रीना कुमारी ने प्रतिनिधित्व किया था और उन्होंने क्रमश: दसवां और 15वां स्थान प्राप्त किया था और इस प्रदर्शन को संतोषजनक माना गया था। लेकिन चार सालों में हालात बदले हैं और इस दौरान डोला बनर्जी और मंगल सिंह चांपिया ने विश्व स्तर पर अपने प्रदर्शन का डंका बजाया है और देशवासियों के इस खेल में पदक जीतने की उम्मीद करने की यही प्रमुख वजह भी है। डोला बनर्जी ने तो पिछले साल दुबई में हुए तीरंदाजी विश्व कप में रिकर्व का खिताब जीतकर सभी को चौंका दिया था। इसी तरह मंगल सिंह चांपिया ने इस साल मई में तुर्की के अंटाल्या शहर में हुए विश्व कप में रिकर्व स्पर्धा में अपने क"रिअर का सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन करके 864 अंक बना दिखाए थे और वह विश्व रिकार्ड बनाने से मात्र तीन अंक से चूक गए थे। इससे पहले चीन में हुई एशियाई महाद्वीपीय चैंपियनशिप में उन्हों रजत पदक जीतकर आ॓लंपिक के लिए क्वालिफाई किया था। इससे यह तो लगता है कि भारतीय तीरंदाज यदि पेइचिंग में अपना सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन करते हैं तो पदक दौड़ में शामिल हो सकते हैं। तीरंदाजी दल में डोला और चांपिया के अलावा परिणिता और एल बोंबयाला देवी शामिल हैं। यह दोनों तीरंदाज भी काफी प्रतिभाशाली हैं। पर इनका अनुभव डोला के मुकाबले कम है। इसलिए उन्हें आ॓लंपिक में भाग लेते समय धड़कनों पर काबू रखने की जरूरत पड़ेगी और इनका प्रदर्शन इस बात पर काफी कुछ निर्भर करेगा। डोला बनर्जी ने पिछले दिनों कहा कि मैं चीन 2001 में जा चुकी हूं और वहां चलने वाली हवा बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। हमारे तीरंदाज आमतौर पर इंडोर में अभ्यास करते हैं, इसलिए बदली हुई परिस्थितियों में अपना सर्वश्रेष्ठ देना थोड़ा मुश्किल हो जाता है। वैसे तो हमारे तीरंदाजों ने भी खुली हवा में इस बार अभ्यास किया है। पर हमारी दिक्कत शायद यह है कि हमारे तीरंदाजों को विभिन्न परिस्थितियों में अपना सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन देने का अभ्यास नहीं है। इस कमी को तो ज्यादा से ज्यादा अंतरराष्ट्रीय अभ्यास देकर ही दूर किया जा सकता है। इस मामले में हमारी स्थिति कोरिया और इटली के तीरंदाजों जैसी नहीं है। डोला बनर्जी के पिछले साल सितंबर में रिकर्व में विश्व चैंपियन बनने के बाद उनकी रैंकिंग में तेजी से गिरावट आने से एक समय तो यह सोचा जाने लगा था कि वे पेइचिंग जाने वाले दल में स्थान भी बना पाएंगी या नहीं। पर डोला पक्के इरादे वाली तीरंदाज हैं। उन्होंने जमकर अभ्यास किया और जून में कोलकाता स्थित साई सेंटर पर आयोजित ट्रायल्स में पहले स्थान पर रहकर टीम में ही स्थान नहीं बनाया बल्कि आ॓लंपिक में देश को पहला तीरंदाजी पदक दिलाने की उम्मीदें भी बंधा दीं हैं। डोला ने कहा भी है कि आ॓लंपिक में हम अभी तक कोई पदक नहीं जीत सके हैं। लेकिन पेइचिंग में हम पदक जीतकर नई शुरूआत करने का इरादा रखते हैं। अगर हम ऐसा कर सके तो देश के अन्य तीरंदाजों के लिए प्रेरणा बन सकेंगे। इस बात में दम दिखता है कि एक बार पदक की शुरूआत हो गई तो तीरंदाजी में देश का आने वाला कल सुनहरी हो सकता है। पेईचिंग में नजर नहीं आएंगे पॉल हैम
आ॓लंपिक खेलगांव में बसने लगी बस्ती
आ॓लंपिक में सबसे बड़ा 1099 सदस्यों का दल उतारने वाले चीन के खिलाड़ियों ने अपना राष्ट्रध्वज लहराते हुए सबसे पहले खेलगांव में प्रवेश किया। एथेंस आ॓लंपिक में 110 मीटर बाधा दौड़ के चैम्पियन लियू शियांग और बास्केटबाल स्टार याआ॓ मिंग समारोह में भाग लेने वाले सौ खिलाड़ियों में से थे। खेलगांव में अंतरराष्ट्रीय परिसर, रिहायशी परिसर और संचालन परिसर होंगे। इसके रेस्त्रां में 5000 लोग एक साथ भोजन कर सकते हैं। इसमें दमकल केंद्र, कॉफी शॉप, टी हाउस, सैलून, डाकखाना, बाजार, पुस्तकालय और अस्पताल भी हैं। खेलगांव में हर धर्म के लोगों की पूजा-इबादत के लिए एक सर्वधर्म आस्था केंद्र बनाया गया है। इसमें ईसाई, मुसलमान, बौद्ध, हिंदू और यहूदी समेत सभी धर्मों के खिलाड़ी और अधिकारी प्रार्थना कर सकेंगे। इसके लिए कई भाषाएं बोलने वाले धर्मगुरूओं की सेवाएं ली जा रही हैं। चीन ने कहा है कि खेलों के दौरान खिलाड़ियों, अधिकारियों, दर्शकों और पर्यटकों को बाइबिल की मुफ्त प्रतियां बांटी जाएंगी। आ॓लंपिक खेलों के दौरान आतंकवाद के खतरे को भांपते हुए चीन ने विभिन्न स्तर पर सुरक्षा के चाक चौबंद उपाय किये हैं। खेलगांव में 42 अपार्टमेंट बनाये गए हैं जिसमें 17 हजार लोगों के ठहरने के लिए नौ हजार कमरों की व्यवस्था है। इसके अलावा इसमें ऊर्जा बचाने वाली तकनीकों का इस्तेमाल किया गया है। इसके अलावा पानी का दोबारा इस्तेमाल करने वाली प्रणाली, पर्यावरण अनुकूल निर्माण सामग्री और सौर ऊर्जा से बिजली की व्यवस्था की गई है जो ग्रीन आ॓लंपिक के पेइचिंग के नारे की घोतक हैं। अंतरराष्ट्रीय आ॓लंपिक समिति (आईआ॓सी) के अध्यक्ष जैक्स रोगे को खेल गांव में एक कमरा आवंटित किया जाएगा, जबकि मेयर चेन परंपरागत पेइचिंग (सिहेयुआन) में रहेंगे। यह खेलगांव 27 अगस्त को बंद हो जाएगा जब दुनिया भर से जमा होने वाले खिलाड़ी यहां बिताये लम्हों का सरमाया साथ लेकर अपने अपने ठिकानों को लौटेंगे और यहां छोड़ जाएंगे यादों का पिटारा। मोम की गुड़िया : नादिया मोहम्मद ईशा उद्दीन
आ॓नेस्टी शहर में पैदा हुई नादिया कोमानेसी ने वास्तव में जिस समय परफेक्ट टेन का प्रदर्शन किया उस समय किसी को भी यह समझ में नहीं आया कि आखिरकार हुआ क्या। इलेक्ट्रोनिक स्कोर बोर्ड पर सिर्फ 1.00 दिखाया जा रहा था। लेकिन फिर बताया गया कि यह स्कोर 10.00 है। असल में उस समय दस में दस अंक पाना किसी खिलाड़ी के लिए आसान नहीं था। इसलिए स्कोर बोर्ड के लिए 10.00 की प्रोग्रामिंग नहीं की जाती थी। जो भी हो, नादिया ने मांट्रियल में आलराउंड तथा अनईवन बार्स का स्वर्ण पदक अपने नाम किया। इसके अलावा फ्लोर में कांस्य पदक हासिल किया। टीम मुकाबले का रजत पदक भी रोमानिया को मिला जिसकी वह सदस्य थी। 1980 के मास्को आ॓लंपिक में भी नादिया ने कमाल का प्रदर्शन किया। बीम और फ्लोर का स्वर्ण पाने के अलावा उसने टीम व आलराउंड का रजत भी जीता। वास्तव में नादिया मास्को में और भी बेहतर करने का प्रमाण पत्र लेकर लौटती, लेकिन रूसी जिम्नास्ट येलेना के पक्ष में गलत निर्णय दिये जाने से ऐसा नहीं हो सका। नादिया ने अपना क"रियर केवल छह साल की उम्र में शुरू किया। बेला कारोली ने उसके क"रियर संवराने में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी। रोक सको तो रोक लो! मनीष शर्मा
शुरू में हाई जंपर थे लियु शियांग ने क"रियर ऊंची कूद में शुरू किया थो। लेकिन अपनी लंबाई बढ़ती न देख वह 15 साल की उम्र में बाधा दौड़ से जुड़ गए। शियांग की प्रतिभा को सबसे पहले पहचाना उनके कोच सुन हैपिंग ने। तब, शियांग हाई स्कूल मीट की 110 मी. बाधा दौड़ में हिस्सा ले रहे थे। इसके बाद सुन ने शियांग की तकनीक पर काम किया और तब से उसने पीछे मुड़कर नहीं देखा। पहले चीनी एथलीट लियु ‘ट्रिपल क्राउन’ (विश्व रिकार्डधारी, विश्व और आ॓लंपिक चैंपियन) हासिल करने वाले पहले चीनी एथलीट हैं। 31 अगस्त 2007 को आ॓साका (जापान) में हुई विश्व चैंपियनशिप में लियु ने 110 मी. बाधा दौड़ में स्वर्ण पदक जीता। उन्होंने 12.95 सेकेंड का समय निकाला और वह पहली बार विश्व चैंपियन बने। बहरहाल, पेइचिंग आ॓लंपिक में वह हमवतन बास्केटबाल स्टार याआ॓ मिंग के साथ चीन के पोस्टर ब्वाय बने हुए हैं। टांगों का बीमा चीन में हर तरफ शियांग के नाम की धूम है। महाकुंभ से पिंग अन आफ चाइना इंश्योरेंस कंपनी ने उनकी टांगों का 13.3 मिलियन की भारी-भरकम राशि का बीमा किया गया। इस पर इस स्टार धावक ने कहा, ‘मेरी टांगों की कोई भी कीमत कम है। ये अमूल्य हैं। मुझे इस राशि की कोई परवाह नहीं है। उम्मीद है कि मैं कभी भी यह राशि नहीं लूंगा।’ उम्मीदें आसमान पर लियु शियांग से सरकार सहित सभी मेजबान खेलप्रेमी महाकुंभ में बहुत ज्यादा उम्मीदें लगाए हुए हैं। मंत्रालय उन्हें हर संभव मदद कर रहा है। चीन में हाल ही में हुए एक सर्वे में फिलहाल लोगों की पहली इच्छा शियांग के पेइचिंग में स्वर्ण पदक जीतने की है। लियु के कोच सुन हैपिंग ने कहा, ‘खेल मंत्रालय के अधिकारियों ने हमसे कहा कि अगर शियांग ने पेइचिंग में स्वर्ण नहीं जीता, तो उनकी पिछली सभी उपलब्यिां बेमानी हो जाएंगी।’ यह सही है कि शियांग पर थोड़ा दबाव है, पर यह ज्यादा होने नहीं जा रहा। ऐसे में लियु को सोना हासिल करने के लिए थोड़ा जोर लगाना होगा। ब्रिटेन के पूर्व चैंपियन कोलिन जैक्सन ने शियांग के बारे में कहा, ‘मुझे नहीं लगता कि चीन में प्रधानमंत्री भी इतने ज्यादा प्रसिद्व हैं, जितने कि शियांग।’ सायना से भी हैं उम्मीदें प्रवीण सिन्हा
आ॓लंपिक की व्यक्तिगत स्पर्धाओं में भाग ले रहे ज्यादातर खिलाड़ियों से आप बात करेंगे तो वे अपनी संभावनाओं के बारे में बताने के समय ‘अच्छा ड्रा’ मिलने की चर्चा जरूर करेंगे। लेकिन विश्व की 16वीं रैंकिंग की सायना नेहवाल से अगर आप पूछेंगे तो वह तपाक से जवाब देंगी कि विश्व की नंबर एक चीनी खिलाड़ी जी जिंग फांग और डेनमार्क की रासमुसेन से भिड़ने में उन्हें मजा आएगा। वह कभी भी किसी शीर्षस्थ रैंकिंग की खिलाड़ी से भिड़ने के नाम पर जरा भी दबाव में नहीं आती हैं। 18 वर्षीय सायना ने कहा भी है, ‘वे दोनों दुनिया की बेहतरीन खिलाड़ियों में से हैं। अगर मैं उन्हें हरा देती हूं तो इससे बेहतर और कोई बात नहीं हो सकती, जबकि हार गई तो अगली बार उन्हें कड़ी टक्कर देने का भरोसा रहेगा।’ इन दिनों हैदराबाद के गाचीबोली स्टेडियम में गोपीचंद से प्रशिक्षण ले रहीं सायना रूटीन अभ्यास के अलावा अपनी स्टेमिना बढ़ाने में लगी हुई हैं। सायना का मानना है कि जिंग फांग और रासमुसेन जैसी खिलाड़ी अपनी प्रतिद्वंद्वी को कोर्ट पर दौड़ा-दौड़ा कर इतना थका देती हैं कि वे अंतत: हार मान लेती हैं। सायना उन खिलाड़ियों को उन्हीं के हथियार (स्टेमिना) से मात देने के लिए इन दिनों कड़ा अभ्यास कर रही हैं। सायना हर दिन करीबन 8-9 घंटे कोर्ट पर अभ्यास करती हैं। 2006 में फिलीपींस आ॓पन जीतने वाली पहली भारतीय महिला सायना दो बार एशियन सेटेलाइट बैडमिंटन टूर्नामेंट जीतने वाली एकमात्र भारतीय खिलाड़ी हैं। इसके अलावा सायना 2006 विश्व जूनियर बैडमिंटन टूर्नामेंट के फाइनल तक का सफर तय करने में भी सफल रही थीं। यही नहीं, पिछले दिनों सिंगापुर आ॓पन के सेमीफाइनल और थाईलैंड आ॓पन के क्वार्टर फाइनल तक का सफर तय करने वाली सायना ने अपने से ऊपर रैंक की खिलाड़ियों को मात देकर खुद को आ॓लंपिक पदक के दावेदारों में शामिल कर लिया है। सायना ने आ॓लंपिक में अपनी दावेदारी के बारे में कहा, ‘मैं बचपन से ही आ॓लंपिक में स्वर्ण पदक जीतने का सपना देखा करती थी। विश्व स्तर पर खेलते हुए अभी मुझे दो साल ही हुए हैं और मैं विश्व में 16वीं रैंकिंग पर पहुंच गई हूं। आ॓लंपिक एक बहुत बड़ा मंच है। इसमें खेलने वाले खिलाड़ी दबाव में आ जाते हैं। लेकिन मेरे ऊपर किसी तरह का दबाव नहीं है। मुझसे अभी पदक की ज्यादा उम्मीद नहीं की जा रही है। अभी पदक जीतने का दावा करना भी नासमझी है। लेकिन मैं इतना दावा जरूर कर सकती हूं कि मैं अभी बेहतरीन फार्म में चल रही हूं और अपना सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन करूंगी। वैसे भी दुनिया की शीर्ष 20 खिलाड़ियों में ज्यादा अंतर नहीं होता है। दो-तीन दौर के मैच जीतते ही आप पदक के करीब पहुंच जाते हैं।’ दूसरी आ॓र, पुरूष वर्ग में 25 वर्षीय अनूप श्रीधर अभी विश्व के 33वें नंबर के खिलाड़ी हैं। सायना की ही तरह वह भी बेहद प्रतिभाशाली और जीवट वाले खिलाड़ी हैं। हालांकि इस साल एड़ी में चोट लग जाने के कारण उन्हें कुछ दिनों के लिए कोर्ट से बाहर रहना पड़ा। लेकिन अब वह पूरी तरह फिट हैं और पेइचिंग आ॓लंपिक में बेहतर प्रदर्शन करने के लिए एड़ी चोटी का जोर लगा रहे हैं। आ॓लंपिक में अपनी संभावनाओं के बारे में अनूप स्पष्ट तौर पर कहते हैं कि वह कहां तक का सफर तय करेंगे, कहना मुश्किल है। लेकिन अगर शुरूआत अच्छी रही तो उनकी नजर पदक जीतने पर ही होगी। उन्होंने कहा, ‘मैं विश्व के सर्वश्रेष्ठ खिलाड़ी को हरा सकता हूं। बड़े मुकाबले में सिर्फ अपनी प्रतिभा को प्रदर्शन में उतारने की जरूरत होती है, जो मैं इन दिनों पूरे विश्वास के साथ कर रहा हूं। अनूप श्रीधर के लिए पिछला साल काफी अच्छा बीता। उन्होंने विश्व चैंपियनशिप के क्वार्टर फाइनल तक का सफर तय करने के दौरान आ॓लंपिक चैंपियन तौफिक हिदायत और पूर्व ऑल इंग्लैंड चैंपियन मोहम्मद हफीज हाशिम जैसे धुरंधरों को मात दी। इसके अलावा वह एशियन चैंपियनशिप में भी अपनी चुनौती सेमीफाइनल तक पेश की। जाहिर है, मानसिक तौर पर बेहद टफ खिलाड़ी अनूप पर देशवासियों की नजर रहेगी। लंबी रेस का अरबी घोड़ा गैब्रेसेलासी मनीष शर्मा
मुसीबतें बनी वरदान असेला (अरसी क्षेत्र, इथोपिया) में 18 अप्रैल 1973 को जन्मे लंबी दूरी और रोड रनिंग एथलीट गैब्रेसेलासी दस संतानों में से एक थे। इस महान खिलाड़ी की परवरिश एक फार्म में हुई और काफी अभावों में उनका बचपन गुजरा। गैब्रेसेलासी प्रत्येक सुबह दस किमी. दौड़कर स्कूल जाते थे। और शाम को इसी अंदाज में घर लौटते थे। इसी ने उनके भीतर के धावक को विकसित किया। उनकी योग्यता की एक वजह गैब्रेसेलासी के गांव का समुद्री तल से आठ हजार फीट की ऊंचाई पर होना था। शुरूआती करियर गैब्रेसेलासी को का पहचान तब मिली, जब उन्होंने सियोल में 1992 में विश्व जूनियर चैंपियनशिप में पांच और दस हजार मी. की रेस जीतीं। इसके बाद उन्होंने लगातार चार (वर्ष 1993, |