चीन में भूकंप और म्यांमार में आए चक्रवाती तूफान के बाद यह जाहिर हो गया है कि प्राकृतिक प्रकोपों में खासा इजाफा हो रहा है। विज्ञान मौसम और प्राकृतिक आपदाओं पर लगाम कसने के लिए जतन कर रहा है। मतलब साफ है यदि आपदा नहीं रोक सकते तो नुकसान ही कम करो। वर्तमान में मौसम विज्ञान ने कुछ खास किस्म के चक्रवात की आशंका को 18 से 20 मिनट पहले समझने में काफी हद तक सफलता प्राप्त की है। वैज्ञानिक इसे भी बड़ी सफलता मानते हैं क्योंकि लोगों को आगाह करने में एक सेकेंड भी बहुत मायने रखता है। इतनी अवधि में गैस पाइप लाइनों को बंद किया जा सकता है, डाक्टरों, अस्पतालों को सावधान किया जा सकता है। इसके अतिरिक्त राहत दलों को भी सावधान किया जा सकता है। निसंस्देह इतने समय में लोग घरों से बाहर आ सकते हैं या फिर निकट की सुरक्षित जगह पर पहुंच सकते हैं।

नुस्खे जो आजमाए जा रहे हैं

* दुनिया के तकनीकी विशेषज्ञ अब इस क्षेत्र में काम कर रहै हैं जिससे उपग्रह से मिले गूढ़ चित्रों, स्थानीय मौसम ज्ञान और भूकंप यंत्रों से मिलने वाली जरा सी भी जमीनी या आसमानी हलचल को समय रहते समझा जा सके।

* भौगोलिक बदलाव और मौसम परिवर्तन अपने आप को बार-बार दोहराते हैं। मौसम की इस प्रक्रिया को समझकर आपदाओं का पूर्वानुमान लगाने की जुगत लगाई जा रही है।

* अंतरिक्ष में ऐसे सेंसर लगाने की प्रक्रिया चल रही है जिससे समय रहते तूफानों की बदलती दिशा की जानकारी समझी जा सके।

* विज्ञान पत्रिका न्यू साइटिस्ट में दी गई जानकारी के मुताबिक 2011 तक मौसम की जानकारी वाले विशेष सेटेलाइट छोड़े जाएंगे।

संभावित तरीके

* तकनीकी और लौकिक ज्ञान को समझ बूझकर ऐसी रूपरेखा बननी चाहिए जिससे समय रहते प्राकृतिक आपदाओं का पता लग सके। सुनामी के दौरान अंडमान निकोबार द्वीप समूह में आदिम जनजातियों को किसी तरह की जानमाल का नुकसान नहीं हुआ था। माना जाता है कि इन जातियों के पास प्राकृतिक आपदा के समय जीव-जंतुओं से मिलने वाले संकेतों का हुनर है। जरूरत है इस ज्ञान को लिपिबद्ध किया जाए और समय रहते इसकी जानकारी लोगों तक पहुंचाई जाए।

* मौसम की विभीषिका समझने का प्रयास किया जाना चाहिए और साथ ही साझे प्रयास को ही बेहतर विकल्प का आधार माना जाए।

बढ़ रही है विभीषिका

* संयुक्त राष्ट्र संघ के पास पिछले 150 सालों के समुद्री तुफनों का ब्योरा दर्ज है। जिसके मुताबिक मौसम बिगड़ैल साड़ की तर्ज पर दिन-बदिन अड़ियल और गुस्सैल होता जा रहा है।

* एक अनुमान के मुताबिक उड़ीसा में अक्टूबर 1999 में आए सुपर साइक्लोन आते वक्त यदि समय रहते तैयारी की गई होती तो कम से कम 50 हजार लोगों को बचाया जा सकता था।

* म्यामांर में आए तूफानी समुद्र से जगजाहिर हो गया है कि नुकसान की एक बड़ी वजह वहां की सरकार का निकम्मापन भी हैं लोगों के पास सही वक्त पर सही सूचनाएं नहीं पहुंच रही थीं।

  अरविंद खरे

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